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Monday, August 6, 2018

महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत

महाद्वीपों के प्रवाहित होने की संभावना का सुझाव सर्वप्रथम फ्रांसीसी विद्वान एंटोनियो स्नाइडर में 1858 में दिया किंतु वैज्ञानिकता के अभाव में इस संभावना को नकार दिया गया ।

1910 में टेलर ने स्थल भाग के क्षैतिज स्थानांतरण को मोड़दार पर्वत की व्याख्या के क्रम में प्रस्तुत किया किंतु कई कारणों से इस की संकल्पना भी मान्यता प्राप्त नहीं कर सकी ।

इसके बाद अल्फ्रेड वेगनर ने 1912 में महाद्वीपीय प्रवाह को सिद्धांत के रूप में प्रस्तुत किया तथा 1915 में इसकी विस्तृत विवेचना की । वेगनर के अनुसार कार्बोनीफेरस युग में संसार के सभी महादेश एक साथ एकत्रित थे और एक स्थल खंड के रूप में विद्यमान थे । वेगनर ने इसे पेंजिया कहा । पेंजिया में विभाजन कार्बोनीफेरस युग में प्रारंभ हुआ और महाद्वीपों का वर्तमान स्वरूप पेंजिया के विखंडन तथा इस विखंडित हुए स्थल खंडों के प्रवाहित होकर अलग होने के फलस्वरुप हुआ ।

वेगनर के अनुसार पेंजिया चारों तरफ से जल से घिरा हुआ था जिसे उसने पैंथालासा कहा उनके अनुसार महाद्वीपों ठोस भाग सियाल तथा महासागरीय भूभाग सीमा का बना हुआ है तथा सियाल सीमा पर तैर रहा है । सीमा के ऊपर तैरते हुए पेंजिया का विखंडन और प्रवाह मुख्यता गुरुत्वाकर्षण शक्तियों की असमानता के कारण हुआ ।
वेगनर के अनुसार जब पंजिया में विभाजन हुआ तब 2 दिशाओं में प्रवाह हुआ उत्तर या विषुवत रेखा की ओर तथा पश्चिम की ओर ।


विषुवत रेखा की ओर प्रवाह गुरुत्व बल तथा प्लवनशीलता के बल के कारण हुआ महाद्वीपों का पश्चिम दिशा की ओर प्रवाह सूर्य तथा चंद्रमा के ज्वारीय बल के कारण हुआ । पृथ्वी पश्चिम से पूर्व की दिशा की ओर घूमती है और ज्वारीय बल पृथ्वी के भ्रमण पर ब्रेक लगाते हैं इस कारण महाद्वीपीय भाग पीछे छूट जाते हैं तथा स्थल भाग पश्चिम की ओर प्रवाहित होने लगते हैं ।
पैंजिया का  गुरुत्व बल व प्लवनशीलता के बल के कारण दो भागों में भी खंडित हुआ उत्तरी भाग लारेंसशिया या अंगारालैंड तथा दक्षिण का भाग गोंडवानालैंड कहलाया बीच का भाग टेथिस सागर के रूप में बदल गया।

 जुरासिक काल में गोंडवानालैंड का विभाजन हुआ तथा ज्वारीय बल के कारण प्रायद्वीपीय भारत , मेडागास्कर ऑस्ट्रेलिया तथा अंटार्कटिका गोंडवानालैंड से अलग होकर प्रवाहित हो गए। इसी समय उत्तर व दक्षिण अमेरिका ज्वारीय बल के कारण पश्चिम की ओर प्रवाहित हो गए।  पश्चिम दिशा में प्रवाहित होने के क्रम में सीमा की रूकावट के कारण पश्चिम भाग में राकी तथा एंडीज पर्वतों का निर्माण हुआ । प्रायद्वीपीय भारत के उत्तर की ओर प्रवाहित होने के कारण हिंद महासागर तथा दोनों अमेरिकी महाद्वीपों की पश्चिम की ओर प्रवाहित होने के कारण अटलांटिक महासागर का निर्माण हुआ आर्कटिक सागर तथा उत्तरी ध्रुव सागर का निर्माण महाद्वीपों के उत्तरी ध्रुव से हटने के फलस्वरुप हुआ।  कई दिशाओं में महाद्वीपों के अतिक्रमण के कारण पेन्थालाशा का आकार संकुचित हो गया तथा प्रशांत महासागर बना इस प्रकार स्थल व जल का वर्तमान रूप प्लायोसीन युग तक पूर्ण हो गया।



सिद्धांत के पक्ष में प्रमाण - वेगनर के अनुसार आरंभ में सभी स्थलीय भाग पेंजिया के रूप में थे इसके लिए उन्होंने कई प्रमाण प्रस्तुत की है वेगनर के अनुसार अटलांटिक महासागर के दोनों तटों के भौगोलिक एकरूपता पाई जाती है इस एकरूपता के कारण उन्हें आसानी से जोड़ा जा सकता है ।

दक्षिण अमेरिका के पूर्वी तट और अफ्रीका के पश्चिमी तट से मिलाया जा सकता है और इसी प्रकार उत्तरी अमेरिका के पूर्वी यूरोप के पश्चिमी तट से जोड़ा जा सकता है इस स्थिति को जिग सा फिट करते हैं ।

भूगर्भिक प्रमाणों के आधार पर अटलांटिक महासागर के दोनों तटों के कैलिडोनियन तथा हर्सिनियन पर्वत क्रमों में समानता पाई जाती है । दक्षिणी अटलांटिक महासागर के तट पर स्थित अफ्रीका ब्राजील की संरचना और चट्टानों में भी समानताहै।

 दक्षिणी अमेरिका के पूर्वी अफ्रीका के पश्चिमी तटों का अध्ययन यह प्रमाणित करता है कि दोनों तटों की संरचना में एकरूपता प्राप्त होता है । इसके अलावा भारत, दक्षिण अफ्रीका , फॉकलैंड ,ऑस्ट्रेलिया तथा अंटार्कटिका में यह प्रमाणित करता है कि सभी एक ही भाग से जुड़े हुए थे ।


आलोचना - इस सिद्धांत की आलोचना प्रवाह की शक्तियों के संदर्भ में की गई हैं जिनको महाद्वीपों के प्रवाह के लिए उत्तरदाई बताया है वह उपयुक्त नहीं है इसके अलावा वेगनर के सिद्धांत में परस्पर विरोधी बातें भी दिखाई देती हैं पहले उन्होंने कहा कि सियाल सीमा पर बिना रुकावट तैर रहा है और फिर कहा कि सीमा से सियाल  पर रुकावट आई ।


वेगनर ने उस बल के बारे में भी नहीं बताया जिससे कार्बोनिफेरस युग में पहले पैंजिया स्थिर अवस्था में था ।

अटलांटिक तटो के आधार पर वेगनर ने एकरूपता पर जितना जोर दिया है वास्तव में बहुत हद तक सही नहीं है क्योंकि दोनों तटों का भूगर्भिक बनावट सभी जगह मेल नहीं खाती।

 लेकिन इस आलोचनाओं के बावजूद भी वेगनर के सिद्धांत का अपना अलग महत्व है इस सिद्धांत के द्वारा अनेक भौगोलिक और भूवैज्ञानिक समस्याओं को सुलझाने में मदद मिली है।  समय के साथ  नये अनुसंधानो ने  इसकी पुष्टि की है और प्लेट विवर्तनिकी व पूरा- चुमकत्व सिद्धांत द्वारा इस सिद्धांत के समर्थन के कई प्रमाण मिले हैं।

Wednesday, February 21, 2018

भारत के इतिहास लेखन की परम्परा एवं विचारधारा

भारतीय इतिहास लेखन की प्रमुख विशेषता
  1. भारत के बारे में इतिहास लेखन की परम्परा का प्रारम्भ भारत की सीमा के बाहर हुआ।
  2. भारतीय इतिहास का लेखन सर्वप्रथम यूनानी लेखकों के द्वारा किया गया 
  3. प्रमुख यूनानी इतिहास लेखक - हेरोडोटस नियार्कस, मेगस्थनीज, प्लूटो, एरियन, स्ट्रैबो, प्लिनी, टालमी आदि।
  4. भारतीय इतिहास के लेखन का दूसरा चरण अलबरूनी से प्रारम्भ हुआ। अलबरूनी संस्कृत का ज्ञाता था। वह महमूद गजनवी के समकालीन था।
  5. अलबरूनी के पश्चात यूरोपीय इतिहासकारो विशेषकर ईसाई धर्म प्रचारकों ने भारत के बारे में अनेक धर्म ग्रन्थों की रचना की।
  6. भारत मे साम्राज्यवादी इतिहास लेखन ईसाई धर्म प्रचारकों से प्रभावित रहा।
1784 में स्थापित एशियाटिक सोसायटी ऑफ बंगाल का भी महत्वपूर्ण प्रभाव है।


प्रमुख विचारधारा एवं लेखक

साम्राज्यवादी इतिहास लेखक -विलियम जॉन्स, मैक्समूलर,     मोनियर विलियमस,  कार्ल मार्कस, एफ.डब्ल्यू हेंगल,  विसेन्ट, आर्थर स्मिथ    आदि।



राष्ट्रवादी इतिहास लेखक - D.R.भण्डारकर,   एच.सी. रायचौधरी,  आर.सी.मजूमदार,  पी.वी.काणे,  के.ऐ. नीलकंठ,  के.पी. जायसवाल,  ए.एस. अल्टेकर,    आदि।




20वी शताब्दी के दौरान मार्क्सवादी विचारधारा का प्रभाव रहा , इसका जनक डी.डी. कौशाम्बी को माना जाता है।


मार्क्सवादी इतिहास लेखक -  डी. आर. चन्ना,   आर. एस. शर्मा,      रोमिला थापर , इरफान हबीब,  विपिन चन्द्र,    सतीश चन्द्र ।आदि।




वर्तमान में भारतीय इतिहास लिखन में बहुविषयक दृष्टिकोण का प्रभाव है।

Monday, September 25, 2017

राष्ट्रकूट

राष्ट्रकूट वंश का संस्थापक दंतिदुर्ग(752ई.) था ।
इसकी राजधानी मनकिर या मान्यखेत ( वर्तमान मालखेड , शोलापुर के निकट) थी।

राष्ट्रकूट वंश के प्रमुख शासक थे
(1) कृष्ण प्रथम

(2) ध्रुव

(3) गोविंद तृतीय

(4) अमोघवर्ष

(5) कृष्ण द्वितीय

(6) इंद्र तृतीय

(7) कृष्ण तृतीय

एलोरा के प्रसिद्ध कैलाश मंदिर का निर्माण कृष्ण प्रथम ने कराया था ।
ध्रुव राष्ट्रकूट वंश का पहला शासक था जिसने कन्नौज पर अधिकार करने हेतु त्रिपक्षीय संघर्ष में भाग लिया और प्रतिहार नरेश वत्सराज एवं पाल नरेश धर्मपाल को पराजित किया ।

ध्रुव को धारावर्ष भी कहा जाता था ।

गोविंद तृतीय ने त्रिपक्षीय संघर्ष में भाग लेकर चक्रायुद्ध एवं उसके संरक्षक  तथा प्रतिहार वंश के शासक नागभट्ट द्वितीय को पराजित किया ।
पल्लव ,पांड्य, केरल एवं गंग शासकों के संघ को गोविंद तृतीय नष्ट किया ।

अमोघवर्ष जैन धर्म का अनुयायी था उसने कन्नड़ में कविराजमार्ग की रचना की ।

आदिपुराण की रचनाकार जिनसेंन,
गणितासार संग्रह के लेखक महावीराचार्य एवं अमोघवृति  के लेखक सक्त्याना अमोघवर्ष के दरबार में रहते थे ।

अमोधवर्ष ने तुंगभद्रा नदी में जल समाधि लेकर अपने जीवन का अंत किया।

इंद्र तृतीय शासन काल में अरब निवासी आलमसुदी भारत आया। इसमें तत्कालीन राष्ट्रकूट शासक को भारत का सर्वश्रेष्ठ शासक कहा ।राष्ट्रकूट वंश का अंतिम महान शासक कृष्ण तृतीय था । इसी के दरबार में कन्नड़ भाषा की कवि पोन्न रहते थे । जिन्होंने शांतिपूराण की रचना की ।

कल्याणी के चालुक्य तैलप- द्वितीय ने 973 ई. में कर्क को हराकर राष्ट्रकूट राज्य पर अपना अधिकार कर लिया और कल्याणी के चालुक्य वंश की नींव डाली।

एलोरा एवं एलीफेंटा महाराष्ट्र वह मंदिरों का निर्माण राष्ट्रकूटों के समय में ही हुआ एलोरा की 34 शैलाकृत गुफाएं हैं जिनमें 1 से 12 तक बौद्धों, 13 से 29 तक हिंदुओं एवं 30 से 34 जैनों की गुफाएं है ।

राष्ट्रकूट ,शैव ,वैष्णव ,शाक्त संप्रदाय के साथ-साथ जैन धर्म के भी उपासक थे। राष्ट्रकूटों ने अपने राज्य में मुसलमान व्यापारियों को बसने तथा इस्लाम का प्रचार करने की स्वीकृति दी।

दक्षिण भारत के प्रमुख राजवंश ( पल्लव वंश )

पल्लव वंश का संस्थापक सिंहविष्णु (575 -600ई) था उसकी राजधानी कांची (तमिलनाडु के कांचीपुरम) थी ।

यह  वैष्णव धर्म का अनुयायी था।
किरातार्जुनीयम के लेखक भारवि सिंहविष्णु के दरबार में रहते थे ।

पल्लव वंश के प्रमुख शासक हुए क्रम-

(1)  महेंद्र वर्मन प्रथम (600 -630 ई.)

(2) नरसिंह सिंह वर्मन प्रथम( 630 668 ई.)

(3) महेंद्र वर्मन द्वितीय (668 से 670)

(4) परमेश्वर वर्मन प्रथम (670-680ई.)

(5) नरसिंह वर्मन द्वितीय (704- 728ई.)

(6)  नंदी वर्मन द्वितीय (731 से 795 ई.)

पल्लव वंश का अंतिम शासक अपराजित ( 879 से 897) हुआ।

मतविलास प्रहसन की रचना महेंद्र वर्मन ने की थी। महाबलीपुरम के एकाश्म मंदिर जिसे रथ कहा गया है का निर्माण पल्लव राजा नरसिंह वर्मन प्रथम के द्वारा कराया गया था ।
रथ मंदिरों में सबसे छोटा द्रौपदी रथ है जिसमें किसी प्रकार का अलंकरण नहीं मिलता।

वातापीकोंड की उपाधि नरसिंहवर्मन प्रथम ने धारण की थी ।अरबों के आक्रमण के समय पल्लवो का शासक नरसिंह वर्मन द्वितीय था ।उसने राजासिंह ( राजाओ में सिंह), आगमप्रिय (शास्त्रों का प्रेमी), शंकरभक्त (भगवान शिव का उपासक )आदि की उपाधि धारण की।

उसने कांची के कैलाशनाथ मंदिर का निर्माण कराया जिसे राजसिद्धेश्वर मंदिर भी कहा जाता है ।इसी मंदिर के निर्माण में द्रविड़ स्थापत्य कला की शुरुआत हुई (महाबलीपुरम में शोर मंदिर)

दशकुमारचरित के लेखक दण्डी नरसिंह वर्मन द्वितीय के दरबार में रहते थे । कांची के मुक्तेश्वर मंदिर तथा बैकुंठ पेरुमल मंदिर का निर्माण नंदी वर्मन द्वितीय ने कराया। प्रसिद्ध वैष्णव संत तिरुमङगई अलवार नन्दी वर्मन के समकालीन थे।

पुष्यभूति वंश या वर्धन वंश

गुप्त वंश के पतन के बाद जिन नए राजवंशों का उदय हुआ उनमे मौखरि, मैत्रक , पुष्यभूतिपरवर्ती गुप्त और गौंड प्रमुख है
इन राजवंशों में पुष्यभूति वंश के शासकों ने सबसे विशाल साम्राज्य स्थापित किया।
पुष्यभूति वंश के संस्थापक पुष्यभूति थे इनकी राजधानी थानेश्वर थी।

प्रभाकरवर्धन  इस वंश की स्वतंत्रता का जन्मदाता था तथा प्रथम प्रभावशाली शासक जिसने परमभटटारक और महाराजाधिराज जैसी सम्मानजनक उपाधि धारण की ।

प्रभाकर वर्धन की पत्नी यशोमती के दो पुत्र राजवर्धन एवं हर्षवर्धन हुए तथा एक कन्या भी जिसका नाम राजश्री था।

राजश्री का विवाह कन्नौज के मौखरि शासक ग्रहवर्मा के साथ हुआ था।
मालवा के शासक देवगुप्त ने वर्मा की हत्या कर दी और राजश्री को बंदी बना लिया । राजवर्धन ने देवगुप्त को मार डाला परंतु उसके  मित्र गौंड नरेश शशांक ने धोखा देकर राज्यवर्धन की हत्या कर दी।

शशांक शैव धर्म का अनुयाई था जिसने बोधि वृक्ष को कटवा दिया ।

राज्यवर्धन की मृत्यु के बाद 606 ई. में  16 वर्ष की अवस्था में राज्यवर्धन थानेसर की गद्दी पर बैठा ।
हर्ष को शिलादित्य के नाम से भी जाना जाता था। जिसने परमभटटारक नरेश की उपाधि धारण की थी।

हर्ष ने शशांक को पराजित करके कन्नौज पर अधिकार कर लिया तथा उसे अपनी राजधानी बनाया।
हर्ष और पुलकेशिन द्वितीय के बीच नर्मदा नदी के तट पर युद्ध हुआ जिसमें हर्ष को पराजय मिली ।

चीनी यात्री हेनसांग हर्षवर्धन के शासनकाल में भारत आया।  इसे यात्रियों में राजकुमार,  निति का पंडित एवं वर्तमान शाक्यमुनि कहा गया।

वह  नालंदा विश्वविद्यालय में पढ़ने एवं बौद्ध ग्रंथ संग्रह करने के उद्देश्य भारत आया था।

हर्ष  ने 641ई.में अपने दूत चीन  भेजें तथा 643 ई. एवं 445 ई में दो  चीनी दूत उसके दरबार में आये । हर्ष ने कश्मीर के शासक से बुद्ध के दांत अवशेष बलपूर्वक प्राप्त किये।

हर्ष के पूर्वज भगवान शिव और सूर्य के अनन्य उपासक थे प्रारंभ में हर्ष भी अपने कुल देवता शिव के परम भक्त था ।
चीनी यात्री ह्वेनसांग से मिलने के बाद उसने बौद्ध धर्म ग्रहण कर लिया।
हर्ष के समय में नालंदा महाविहार महायान बौद्ध धर्म की शिक्षा का प्रधान केंद्र था।
हर्ष के समय में प्रयाग में प्रति पांचवे वर्ष वार्षिक समारोह आयोजित किया जाता था जिसे महामोक्षपरिषद कहा जाता था ।

बाणभट्ट हर्ष के दरबारी कवि थे उन्होंने हर्षचरित एवं कादंबरी की रचना की ।

प्रियदर्शिका रत्नावली तथा नागानंद नाम 3 संस्कृत नाटक ग्रंथों की रचना हर्ष ने की थी कहा जाता है कि धावक नामक कवि ने हर्ष से पुरस्कार लेकर उसके नाम से यह 3 नाटक लिख दिए ।

हर्ष को भारत का अंतिम हिंदू सम्राट कहा गया है लेकिन वह ना तो कट्टर हिंदू था और ना ही सारे देश का शासक है ।

हर्ष के आधिन्स्थ शासक महाराज अथवा महासामंत कहे जाते थे।
मंत्रिपरिषद में मंत्री को सचिव यह कहा जाता था। प्रशासन की सुविधा के लिए हर्ष का साम्राज्य कई प्रांतों में विभाजित था।

प्रांतों को भुक्ति कहा जाता था और प्रतेक भुक्ति का शासक राजस्थानिक , उपरिक ,  कहा जाता था।

हर्षचरित मे प्रांतीय शासक के लिए लोकपाल शब्द आया है भुक्ति का विभाजन जिलों में हुआ था और जिले की संज्ञा विषय थी जिसका प्रधान विषयपति

विषय के  अंतर्गत पाठक (आधुनिक तहसील)होते थे । ग्राम ,शासन की सबसे छोटी इकाई थी ।ग्राम शासन का प्रधान ग्रामाक्षपटलिक कहा जाता था।

पुलिसकर्मियों को चाट या भाट कहा गया है ।
दंडपाशिक तथा दाण्डिक पुलिस विभाग के अधिकारी होते थे ।
अश्वसेना के अधिकारियों को बृहदेश्वर। तथा  पैदल सेना के अधिकारियों को बलाधिकृत तथा महाबलाधिकृत कहा जाता था।

हर्षचरित में सिंचाई के साधन के रूप में तुला यंत्र का उल्लेख मिलता है हर्ष के समय मथुरा सूती वस्त्रो के निर्माण के लिए प्रसिद्ध थी ।

हर्षचरित के अनुसार हर्ष की मंत्री परिषद

भंडी            -   प्रधान सचिव

सिंहनाद       -  प्रधान सेनापति

कुन्तल        - अश्वसेना का प्रधान

स्कन्दगुप्त    -  गज सेना का प्रमुख

Friday, September 22, 2017

गुप्त साम्राज्य

गुप्त साम्राज्य का उदय तीसरी शताब्दी के अंत में प्रयाग के निकट कौशांबी में हुआ ।

गुप्त वंश का संस्थापक श्री गुप्त (240 -280 ई)था।

।श्रीगुप्त का उत्तराधिकारी घटोत्कच (280-320ई)हुआ।
गुप्त वंश का प्रथम महान सम्राट चंद्रगुप्त प्रथम था।
वह 320 ईस्वी में गद्दी पर बैठा इसने लिच्छवी राजकुमारी कुमार देवी से विवाह किया।
इसने महाराजाधिराज की उपाधि धारण की।

गुप्त संवत (319-320)की शुरुआत चंद्रगुप्त प्रथम ने की।
चंद्रगुप्त प्रथम का उत्तराधिकारी समुद्रगुप्त हुआ जो 335 ईस्वी में राज गद्दी पर बैठा ।
इसने आर्यवर्त के 9  और दक्षिणावर्त के 12 शासको को पराजित किया इन्हीं विजयों के कारण इसे भारत का नेपोलियन कहा जाता है।

समुद्रगुप्त विष्णु का उपासक था ।
समुद्रगुप्त का दरबारी कवि हरिसेण था जिसने इलाहाबाद प्रशस्ति लेख की रचना की ।
समुद्रगुप्त ने अश्वमेधकर्ता की उपाधि धारण की।

समुद्रगुप्त संगीत प्रेमी था ऐसा अनुमान उसके सिक्कों पर वीणा वादन करते दिखाया जाने से लगाया गया है। समुद्रगुप्त ने विक्रमांक की उपाधि धारण की ।
इसे कविराज भी कहा जाता है।

समुद्रगुप्त का उत्तराधिकारी चंद्रगुप्त द्वितीय हुआ जो 380 ईसवी में राज गद्दी पर बैठा।
चंद्रगुप्त द्वितीय के शासनकाल में चीनी यात्री फाह्यान भारत आया ।
शकों पर विजय के उपलक्ष्य में चंद्रगुप्त द्वितीय ने चांदी के सिक्के चलाए ।
चंद्रगुप्त द्वितीय का उत्तराधिकारी कुमारगुप्त प्रथम या गोविंद गुप्ता(415-454ई) हुआ।
नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना कुमारगुप्त ने की थी।
कुमारगुप्त प्रथम का उत्तराधिकारी स्कन्ध गुप्त हुआ स्कन्धगुप्त ने गिरनार पर्वत पर स्थित सुदर्शन झील का पुनरुद्धार गया है ।
स्कंदगुप्त ने पर्णदत्त को स्वराष्ट्र के गवर्नर नियुक्त किया ।
स्कंधगुप्त के शासनकाल में ही हूणों का आक्रमण हुआ था ।

अंतिम गुप्त शासक भानुगुप्त था।

साम्राज्य की सबसे बड़ी प्रादेशिक इकाई देश थी जिसके शासक को गुप्ता कहा जाता था ।
दूसरी प्रदेशिक इकाई भुक्ति थी जिसके शासक को उपरिक कहा जाता था।
भुक्ति के नीचे विषय नाम की प्रशासनिक इकाई होती थी जिसके प्रमुख विषयपति कहलाते थे ।
पुलिस विभाग का मुख्य अधिकारी दंडपाशिक कहलाता था ।

पुलिस विभाग के साधारण कर्मचारियों को चाट एवं भाट कहा जाता था ।
प्रशासन की सबसे छोटी इकाई ग्राम थी और ग्राम का प्रशासन ग्राम सभा द्वारा संचालित होता था । ग्राम सभा का मुख्य ग्रामीण कहलाता था।

एवं अन्य सदस्य महत्तर कहलाते थे । ग्राम समूहो की  छोटी छोटी इकाइयों को पेठ कहा जाता था ।

गुप्त शासक कुमारगुप्त के  दामोदरपुर ताम्रपत में भूमि  विक्री से संबंधित अधिकारियों  के क्रियाकलापों का उल्लेख है।
भू राजस्व उत्पादन का एक चोथाई  भाग से 1/6 भाग होता था।
आर्थिक उपयोगिता के आधार पर निम्न प्रकार की भूमि थी।
(1) क्षेत्र - कृषि योग्य भूमि

(2) वास्तु- वास करने योग्य भूमि

(3) चारागाह भूमि- पशुओ के चारा योग्य भूमि

(4) खिल्य - न जोतने योग्य भूमि

(5) अप्रहत - जंगली भूमि

सिंचाई के लिए रहट या घंटी यंत्र का प्रयोग होता था।
श्रेणी के प्रधान को ज्येष्टक कहा जाता था ।
गुप्त काल में उज्जैन सर्वाधिक महत्वपूर्ण व्यापारिक केंद्र था।
गुप्त राजाओं ने सर्वाधिक स्वर्ण मुद्राएं जारी की उनके स्वर्ण मुद्राओं को अभिलेखों में दिनार कहा गया है।
कायस्थों का सर्वप्रथम वर्णन याज्ञवल्क्य स्मृति में है।

जाति के रूप में कायस्थों का सर्वप्रथम वर्णन ओशनम स्मृति में है ।
विन्ध्य जंगल में सबर जाति के लोग अपने देवताओं को मनुष्य का मांस चढ़ाते थे ।पहली बार किसी के सती होने का प्रमाण 510 ईसवी में भानुगुप्त की एरण अभिलेख से मिलता है जिसमें किसी भोजराज की मृत्यु पर उसकी पत्नी के सती होने का उल्लेख है।

गुप्तकाल में वेश्यावृत्ति करने वाली महिलाओं को गणिका कहा जाता था वृद्ध वेश्याओं को कुट्ट्नी कहा जाता था ।
गुप्त साम्राज्य वैष्णव धर्म के अनुयाई थे तथा उन्होंने इसी राजधर्म बनाया था विष्णु का वाहन गरुड़ गुप्तो का राजचिन्ह था।
गुप्तकाल में वैष्णव धर्म संबंधित सबसे महत्वपूर्ण अवशेष  देवगढ़ झांसी का दशावतार मंदिर है ।

अजन्ता में निर्मित कुल 29 गुफाओं में वर्तमान में से केवल 6 ही शेष  हैं जिनमें गुफा संख्या 16 एवं 17 ही गुप्तकालीन है ।

इनमें गुफा संख्या 16 में उत्कीर्ण मरणासन्न राजकुमारी का चित्र प्रशंसनीय है ।गुफा संख्या 17 के चित्र को चित्रशाला कहा गया है इस चित्रशाला में बुद्ध की जन्म जीवन महाभिनिष्क्रमण एवं महापरिनिर्वाण की घटनाओं से संबंधित चित्र उदृत किए हैं ।अजंता की गुफाएं बौद्ध धर्म की महायान शाखा से संबंधित है।
गुप्त काल में निर्मित अन्य गुफा बाघ की गुफा है जो ग्वालियर के समीप बाघ नामक स्थान पर विंध्य पर्वत को काटकर बनाई गई थी ।

चंद्रगुप्त द्वितीय के शासनकाल में संस्कृत भाषा का सबसे प्रसिद्ध कवि कालिदास था ।
चंद्रगुप्त द्वितीय के दरबार में रहने वाले आयुर्वेदाचार्य धन्वंतरी थे।
गुप्तकाल में विष्णु शर्मा द्वारा लिखित पंचतंत्र संसार का सर्वाधिक प्रचलित ग्रंथ माना जाता है बाइबल के बाद स्थान दूसरा है इसे पांच भागों में बांटा गया है

(1)मित्रभेद  (2) मित्रलाभ  (3) संधि विग्रह  (4)लब्द प्रणाश  (5) अपरिक्षाकारित्व

आर्यभट्ट ने आर्यभट्टीयम एवं सूर्य सिद्धांत नामक ग्रंथ लिखे ।
इसी ने सर्वप्रथम बताया कि पृथ्वी सूर्य के चारों ओर घूमती है

चंद्रगुप्त द्वितीय के दरबार में रहने वाले कुछ प्रमुख विद्वान थे
(1)आर्यभट्ट
(2) वराह मिहिर
(3)धन्वंतरि
(4)ब्रम्हगुप्त

पुराणों की वर्तमान रूप की रचना गुप्त काल में हुई इसमें ऐतिहासिक परंपराओं का उल्लेख है।
गुप्त काल के चाँदी के सिक्कों को रुप्यका कहा जाता था ।
याज्ञवल्क्य भारद्वाज एवं वृहस्पति स्मृतियों  की रचना गुप्त काम में हुई थी ।
मंदिर बनाने की कला गुप्तकाल में ही विकसित हुयी थी सांस्कृतिक उपलब्धियों के कारण गुप्त काल को भारतीय इतिहास श्वर्ण काल कहा जाता है।

Wednesday, September 20, 2017

कुषाण

पहलव के बाद कुषाण आये  जो यूची एवं तोखरी भी कहलाते हैं। युची नामक एक कबीला पांच कुलो में बंट गया था ।उन्हीं में एक कुल के थे  कुषाण

कुषाण वंश का संस्थापक कुजुल केदिफीसेसे था इस बंश का सबसे प्रतापी राजा कनिष्क था उसकी राजधानी पुरुषपुर  या पेशावर थी  कुषाणो की द्वितीय राजधानी मथुरा थी।

कनिष्क ने 78 ई एक सम्वत  चलाया जो सक सम्वत कहलाया  जिसे भारत सरकार द्वारा प्रयोग में लाया जाता है।

बौद्ध धर्म की चौथी बौद्ध संगीति कनिष्क के शासनकाल में कुंडलवन कश्मीर में प्रसिद्ध बौद्ध विद्वान वसुमित्र की अध्यक्षता में हुआ।

कनिष्क बौद्ध धर्म के महायान संप्रदाय का अनुयाई था ।

आरंभिक कुषाण शासको में भारी संख्या में स्वर्ण मुद्राएं जारी की जिनकी शुद्धता गुप्त काल स्वर्ण मुद्राओं से उत्कृष्ट है ।

कनिष्क का राजवैध आयुर्वेद  विद्वान चरक था जिसने चरक संहिता की रचना की।
महाविभाष सूत्र के रचनाकार वसुमित्र हैं इसे ही बौद्ध धर्म का विश्वकोश कहा जाता है ।

कनिष्क के राज्य कवि अश्वघोष न्र  बौद्धों का रामायण बुद्धचरित की रचना की।

वसुमित्र ,पार्श्व , नागार्जुन , महाचेत  एवं संघरक्ष कनिष्क के दरबार के विभूति थे ।  भारत का आइंस्टीन नागार्जुन को कहा जाता है उनकी पुस्तक माध्यमिक सूत्र है ।

कनिष्क की मूर्ति  मृत्यु 102 ई  में हो गई । कुषाण  वंश का अंतिम शासक वासुदेव था  गंधार शैली और मथुरा शैली का विकास कनिष्क के शासन काल में हुआ ।
रेशम मार्ग पर नियंत्रण रखने वाले शासको में सबसे प्रसिद्ध कुषाण थे ।रेशम  बनाने की तकनीक का आविष्कार सबसे पहले चीन में हुआ।

शक

यूनानियों के बाद शक आए । शको की 5 शाखाएं थी। और हर शाखा की राजधानी भारत औरअफगानिस्तान के अलग-अलग भागों में स्थित थी।

पहली शाखा ने अफगानिस्तान

दूसरी शाखा ने पंजाब

तीसरी शाखा नियम मथुरा

चौथी शाखा ने पश्चिमी भारत

पांचवी शाखा ने उत्तरी दक्कन पर प्रभुत्व स्थापित किया ।

शक मूलत: मध्य एशिया  के निवासी थे  जो चारागाह की खोज में भारत आए।

58 ईसवी पूर्व में उज्जैन के एक स्थानीय राजा ने शको को पराजित कर  के बाहर खदेड़ दिया और विक्रमादित्य की उपाधि धारण की ।

शको पर विजय के उपलक्ष्य में 58 ई. पूर्व में एक नया संवत विक्रम संवत के नाम से प्रारंभ हुआ ।

इसी समय से विक्रमादित्य एक लोकप्रिय उपाधि बन गई जिनकी संख्या भारतीय इतिहास में 14 तक पहुंच गई ।

गुप्त सम्राट चंद्रगुप्त द्वितीय सबसे अधिक विख्यात विक्रमादित्य थे।

शको  की अन्य शाखाओं की तुलना में दक्षिण भारत में प्रभुत्व स्थापित करने वाली शाखा ने सबसे लंबे अरसे तक शासन किया। ( 400 सालो तक )

गुजरात में चल रही समुद्री व्यापार से यह शाखा काफी लाभवानित हुई । और  भारी संख्या में चांदी के सिक्के जारी किए।

शकों का सबसे प्रतापी शासक रुद्रदामन प्रथम था , जिसका शासन (130 से 150 ईसवी )  गुजरात के बड़े भाग पर था ।

उसने काठियावाड़ की अर्द्धशुष्क  सुदर्शन झील (मौर्य द्वारा निर्मित ) का जीर्णोद्धार कराया।

रुद्रदामन संस्कृत का बड़ा प्रेमी था उसने ही सबसे पहले विशुद्ध संस्कृत भाषा में लम्बा  अभिलेख (गिरनार अभिलेख ) जारी किया जिसके पहले के सभी अभिलेख प्राकृत भाषा में रचित है भारत में शक राजा अपने को क्षत्रप कहते थे।

भारत के यवन राज्य

भारत पर आक्रमण करने वाले विदेशी आक्रमणकारियों का क्रम है -
हिंद-यूनानीशक , पहलवकुषाण,
सेल्यूकस के द्वारा स्थापित पश्चिमी तथा मध्य एशिया की विशाल साम्राज्य को उसके उत्तराधिकारी एन्टीओकस प्रथम ने अक्षुण्ण बनाए रखा।
एन्टीओकस द्वितीय के शासनकाल में विद्रोह के फलस्वरुप उसके अनेक प्रांत स्वतंत्र हो गए ।
बैक्टीरिया के विद्रोह का नेतृत्व डियोडोट्स प्रथम ने किया।
बैक्टीरिया पर प्रथम के साथ इन राजाओं ने क्रमशा शासन किया-
डियोडोट्स द्वितीय , यूथीडेमस, डेमेट्रियसमिनेन्डरयुक्रेटाईडसएंटी ऑलकिड्स तथा हर्मिक्स
भारत पर सबसे पहले आक्रमण बैक्टीरिया के शासक डेमेट्रियस ने किया उसने 190 ईसवी पूर्व में भारत पर आक्रमण करअफगानिस्तान , पंजाब एवं सिन्ध के बहुत बड़े भाग पर अधिकार कर लिया । उसने शाकल को अपनी राजधानी बनाई इसे ही हिंदी यूनानी या बैटरीयाई  यूनानी कहा गया ।
हिंद- यूनानी शासको में सबसे अधिक विख्यात मिनांडर हुआ , इसकी राजधानी साकल (आधुनिक सियालकोट )शिक्षा का प्रमुख केंद्र था।
मिनांडर ने नागसेन से बौद्ध धर्म की दीक्षा ली।
मिनांडर के प्रश्न एवं नागसेन द्वारा दिए गये उत्तर एक पुस्तक के रुप में संग्रहित हैं । उसका नाम मिलिंदपन्हो अर्थात मिलिंद के प्रश्न व मिलिंद प्रश्न है ।
हिंदी यूनानी भारत के सबसे पहले शासक हुए जिनके जारी किए गए सिक्कों के बारे में निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि सिक्के किन किन राज्यों के हैं।
भारत में सबसे पहले हिंद- यूनानियों ने सोने के सिक्के जारी किए ।
हिंदी यूनानी शासको ने भारत के पश्चिमी सीमा प्रांत में यूनान की प्राचीन कला चलाई जिसे हेलेनिसटिक आर्ट कहते हैं भारत में गांधार कला इसका उत्तम उदाहरण है ।

ब्राम्हण साम्रज्य

पुष्यमित्र शुंग जिसने मगध पर शुंग वंश की नींव डाली ब्राह्मण जाति का था ।
शुंग शासकों ने अपनी राजधानी विदिशा में स्थापित की।

इंडो यूनानी शासक मिनांडर को पुष्यमित्र शुंग ने पराजित किया।
पुष्यमित्र शुंग ने दो बार अश्वमेघ यज्ञ किया ।उसके लिए पतंजलि ने यह अश्वमेध यज्ञ कराए थे ।

भरहुत स्तूप का निर्माण पुष्यमित्र शुंग ने कराया ।

शुंग वंश का अंतिम शासक देवभूति था उसकी हत्या 73 ई. पू. में बासुदेव ने कर दी और मगध की गद्दी पर कण्व  वंश की स्थापना की ।

कण्व वंश का अंतिम शासक सुशर्मा हुआ ।सिमुक ने 60 ईसवी पूर्व में सुशर्मा की हत्या कर दी और सातवाहन वंश की स्थापना की।

सातवाहन (आंध्र वंश )के शासकों ने अपनी पहली राजधानी प्रतिष्ठान में स्थापित की।
प्रतिष्ठान आंध्र प्रदेश के औरंगाबाद जिले में है।

सातवाहन वंश के प्रमुख शासक थे से सिमुक, सातकर्णि , गौतमीपुत्र सातकर्णि , वशिष्ठपुत्र , पुलुमावी , तथा जज्ञश्री सातकर्णि

सातकर्णि ने दो अश्वमेघ तथा एक राजसूय यज्ञ किया।

सातवाहन शासकों के समय के प्रसिद्ध साहित्यकार हाल एवं गुणाढ्य थे।

हाल ने गाथा सप्तशतक तथा गुणाढ्य ने  बृहत्कथा नामक दो पुस्तकों की रचना की।

सातवाहन शासकों ने चांदी, तांबे ,सीसा ,पोटीन और कांसे की मुद्राओं का प्रचलन किया।

ब्राह्मणों को भूमि दान देने की प्रथा का आरंभ सातवाहन शासकों ने ही सर्वप्रथम किया ।

सातवाहनों की भाषा प्राकृत एवं लिपि ब्राह्मी थी।

सातवाहनों का समाज मातृसत्तात्मक था ।

सातवाहनों की महत्वपूर्ण स्थापत्य कृतियां है- कार्ले का चैत्य ,अजंता एवं एलोरा की गुफाओं का निर्माण एवं अमरावती कला का विकास ।

सातकर्णि एवम अन्य सभी सातवाहन शासक दक्षिणापथ के स्वामी कह जाते थे।

सीहोर यात्रा

 लोग कहते हैं जब भगवान की कृपा होती है तो बाबा बुला ही लेते है। बस ऐसा ही मेरे साथ हुआ। मैं बड़ी माँ के यहाँ गया था ( बड़ी माँ और मैं एक ही शह...